द्रौपदी चीरहरण
द्रौपदी चीरहरण कभी नैतिकता की मूर्ति भारतवर्ष मेंयह था अनैतिकता का चरमोत्कर्ष।की केशो तक जा पहुंचे थे हाथजिनको करना था चरणस्पर्श। गौरवशाली इतिहास का वर्तमानथा आज लहूलुहान खड़ामहारथियों से भरी सभा मेंक्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा । नीति निस्तेज, ज्ञान था मौनधर्म भी हो उठा था लज्जित।जब कुलवधू वस्त्रहरण संगकुल मर्यादा हुई थी कलंकित? वास्तव …