द्रौपदी चीरहरण
गौरवशाली इतिहास का वर्तमान
था आज लहूलुहान खड़ा
महारथियों से भरी सभा में
क्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा ।
द्रौपदी चीरहरण

पूछी द्रौपदी चीत्कार कर
कुरु वंश के कुलगुरु कृपाचार्य से।
हे आचार्य परिचय मेरा करवाइए
इस कुल के प्रतिष्ठा के पर्याय से।
युवराज को दंड देने के स्थान पर
नरेश के मुख पर मौन क्यों है?
धर्मवानो,कर्मवानो से भरी सभा में
राजपद की सभ्य प्रतिष्ठा गौण क्यों है ?
यहां की राजनीति की चौसर पर
बिछाई गई पांचाली क्यों है ?
यहां पर नरेश अधिकार हीन
पर युवराज अधिक बलशाली क्यों है ?
अपने प्रतिष्ठित नेत्रों के सामने
जब हो रही अपमान की अनीति है ,
हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने की
यह यहां की कैसी रीति है ?
हे कुलगुरू क्या इस चंद्रवंश में
पति का पत्नी पर सर्वांगीण अधिकार है?
कि चौसर में जब हारे पति
पत्नी बनती उसकी शिकार है?
(धर्म और ज्ञान भी जल चुका था
जब द्रौपदी के अपमान की तपिश में ।
घुल ही जाना था द्रोण को भी
द्रौपदी के प्रश्नों के विष में।)
पूछी ,हे ! पांडव -कौरवों के राजगुरु
हे राजकुमारों के ज्ञान प्रदाता ।
हे पिता के सखा ,आपसे तो मेरा
कुलवधू और पुत्री का दोहरा नाता ।
हे द्रोणाचार्य,तनिक मुझे बताइए
क्या आपके शिष्य समझ नहीं पाए
या आप समझा नहीं सके
कि पत्नी वस्तु नहीं जिसे दांव लगाएं?
संगीता

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दिल से
Nequ
मेरी दीदी को समर्पित
उनके अथक प्रोत्साहन हेतु