आसरा

आसरा

बैठी रहती है चौखट पर ,
बेटे की आस में
वही जो उसके ह्रदय का
एकमात्र टुकड़ा है

आसरा

mithila painting by sai satwik
साभार साई सात्विक

न जाने इस बुढ़िया को यह किस रोग ने यूं जकड़ा है बैठी रहती है चौखट पर ,
बेटे की आस में
वही जो उसके ह्रदय का
एकमात्र टुकड़ा है

गया था जो शहर,
लौट कर आने का वायदा करके
उसे क्या पता था
जीवन का रास्ता बड़ा संकरा है


बढ़ चुका नशे की राह में,
कमाता कम गंवाता अधिक क्योंकि एक नई शौक
नशे को उसने पकड़ा है

सोच रही बूढ़ी मां कहता था जल्दी ही आ जाऊंगा
बस कंपनी के मालिक से
थोड़ा सा लफड़ा है


यहां सब कुछ ठीक-ठाक है
और तू बता कैसी है?
मैं यहां स्वस्थ हूं ,
पैसा भी मिलता तगड़ा है

क्या पता इस बूढ़ी मां को
कि बेटा झूठ भी बोलने लगा कंपनी के मालिक से नहीं
उसका खुद से ही झगड़ा है


हर खुशी खत्म होती उसकी
नशे की अंधेरी गलियों में
अब तो मां और समाज ,
दोनों के लिए वो एक खतरा है

संगीता

साभार रंजना

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