द्रौपदी चीरहरण
गौरवशाली इतिहास का वर्तमान
था आज लहूलुहान खड़ा
महारथियों से भरी सभा में
क्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा ।
द्रौपदी चीरहरण

धर्म ने हीं जब धर्म के द्वार खोले थे
फिर भला कोई क्या कुछ कहते?
उसके अपमान पर अवाक मुख
उसके प्रश्नों पर भी तो चुप ही रहते ?
जिस शरीर को पवन ने ना छुआ
सूरज ने नहीं था देखा।
कैसा दुर्भाग्य कि उसी को हाथ लगाने
घरवाले ही पार कर गए लक्ष्मण रेखा?
वह क्षण कौरवों का था अंतिम दिन
बच ना पाया कोई द्रौपदी के श्राप से।
गांधारी की क्षमा प्रार्थना भी काम ना आई
धू धू कर जले सारे द्रौपदी के संताप से।
संगीता

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दिल से
Nequ
मेरी दीदी को समर्पित
उनके अथक प्रोत्साहन हेतु