द्रौपदी चीरहरण
गौरवशाली इतिहास का वर्तमान
था आज लहूलुहान खड़ा
महारथियों से भरी सभा में
क्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा ।
द्रौपदी चीरहरण

अग्नि से उत्पन्न दिव्य जन्मा
अग्नि पुत्री ,वह द्रुपद नंदिनी ।
अब पहुंची ज्येष्ठ पिताश्री सम्मुख
लिए नेत्रों में अपमान की अग्नि।
बोली ,नरेश बड़े भाग्यशाली हैं आप
जो जन्मजात ही नेत्रहीन हैं ।
आपकी कुलवधू का अपमान देख
आज तो नेत्र वालों की भी ज्योति क्षीण है ।
हे हस्तिनापुर नरेश, आप की सभा में
आपकी ही कुलवधु का अपमान हुआ है।
उस द्रुपद नंदनी इंद्रप्रस्थ रानी का
जिसके दासी को भी किसी ने न छुआ है।
आपके पुत्रों ने भरी सभा में
आपके ही मान को तार-तार किया है।
दंडित कीजिए उस जिह्वा और हस्त को
जिन्होंने मुझ पर अत्याचार किया है।
हे ज्येष्ठ पिताश्री ,हे न्यायाधीश
नरेश होकर यूं मौन न रहिए ।
यदि आप भी चुप रहे
तो मुझे उत्तर देगा कौन यह कहिए ?
कि क्या एक पत्नी को दांव लगाने का
पति को पूरा अधिकार है?
यदि पत्नी हारी पति संग ही
तो क्यों लगी दांव दो बार है ?
(अंधे नरेश के अंधकार युग में
न्याय भी सारे अंधे थे।
जिन हाथों को दंड देना था
वह स्वपुत्रमोह से बंधे थे ।)
संगीता

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दिल से
Nequ
मेरी दीदी को समर्पित
उनके अथक प्रोत्साहन हेतु