द्रौपदी चीरहरण

द्रौपदी चीरहरण

गौरवशाली इतिहास का वर्तमान
था आज लहूलुहान खड़ा
महारथियों से भरी सभा में
क्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा ।

द्रौपदी चीरहरण

साभार रंजना

अपने प्रश्नों को लेकर द्रौपदी
सर्वप्रथम गई पितामह सम्मुख।
जिन्हें आज था दुर्योधन से अधिक
पांडवो के पितामह होने का दुख।

पूछी,हे राजरक्षा की प्रतिज्ञावाले
क्या राजमर्यादा से आपका नाता नहीं है?
या आपकी राजरक्षा के वचन में
राजपरिवार का सम्मान आता नहीं है??

हे पितामह, आपके कुरूवंश में
कुलरक्षा की वचन का मर्म क्या है?
कुलवधु का अपमान सहना कायरता नहीं
तो फिर यहां का क्षत्रिय धर्म क्या है?

हमारे पिता के कुल में तो लोग
कुल की मान के लिए मर मिटते हैं।
क्या प्रतापी महान भरत के वंशज
कुलवधु के अपमान पर चुप रहते हैं?

हे कुल श्रेष्ठ, यदि मै कुलवधु नहीं
आपकी सगी पुत्री होती।
मेरे इस अपमान पर हे वीरोत्तम
तब भी क्या केवल आपकी आंखे रोती।

हे संसार के सबसे महान योद्धा
आप तो इस कुल में सबसे बड़े हैं।
उखाड़ फेंकिए दुर्बुद्धि शकुनी को
जिसके छांव में बढ़ी पापी जड़े हैं।

हे भारतवंशी शिरोमणि मुझे बताइए
क्या पत्नी पति की संपति हैं?
यदि वो संपति नहीं तो उसपर
क्यों लगी दांव की विपत्ति है?

(पितामह को रोता हुआ पाकर
पहुंची द्रौपदी काका विदुर के पास।
अश्रु और जिव्हा पर धरे प्रश्नों की
यहां थी उसे उत्तर मिलने की आस।)

संगीता

साभार साई सात्विक

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