द्रौपदी चीरहरण
गौरवशाली इतिहास का वर्तमान
था आज लहूलुहान खड़ा
महारथियों से भरी सभा में
क्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा ।
द्रौपदी चीरहरण

अपने प्रश्नों के तीर से उसने
पति परमेश्वर युधिष्ठिर को यूं धिक्कारा
हे पत्नी को दांव पर लगाने वाले
आपने पहले स्वयं या मुझ को हारा?
मुझे दांव पर लगाने से पहले
क्या आपको यह नहीं सूझा था?
मैं केवल आपकी पत्नी नहीं
क्या मेरे बाकी पतियों से पूछा था ??
संसार में आपसे पहले भी
बहुत बड़े-बड़े जुआरी हुए हैं ।
किंतु उन्होंने अपनी पत्नी तो क्या
दासी भी ना दांव पर दिए हैं ।
सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, गदाधर, सर्वगुण संपन्न
पांच पतियों वाली अभागिन मैं,
आज से आप सबकी मान नहीं
अपमान की घायल नागिन मैं
भरतश्रेष्ठो और आचार्यों के सम्मुख
क्यों लेकर गई थी अपनी व्यथा का कोष?
चौसर पर मान को दान देने वाले
जब स्वयं मेरे धर्मात्मा पति में दोष ?
( जो छोड़ चुके थे तपती मरु में
अपनी किन सद्गुणों की देते छांव?
धन-संपत्ति राज्य की मान मर्यादा,
प्रतिष्ठा तक जो लगा चुके थे दांव?
जो स्वयं थे प्रश्न,द्रौपदी के लिए
वह क्या दूर करते उसकी जिज्ञासा
लज्जित सभा में सिवाय झुके शीशों के
उसे ना थी कुछ और मिलने की आशा)
संगीता

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दिल से
Nequ
मेरी दीदी को समर्पित
उनके अथक प्रोत्साहन हेतु