द्रौपदी चीरहरण
गौरवशाली इतिहास का वर्तमान
था आज लहूलुहान खड़ा
महारथियों से भरी सभा में
क्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा ।
द्रौपदी चीरहरण

हे राजगुरु ,अपने शिष्यों को
कैसा पढ़ाया सभ्यता का पाठ ?
धर्म अधर्म संबंधों को भूल
मनुष्यता त्याग बन बैठे यह काठ?
महान द्रोण के शिष्यों में
आई कहां से यह असभ्यता?
मान को सम्मान ना देकर
दांव लगा दे उसकी निजता?
कौरवों ने गुरुवर के सानिध्य में
किया क्या यही कलुषित ज्ञानार्जन?
कि अक्षम्य अपराध पर भी
हंसकर करें निर्लज्जता का प्रदर्शन?
जिन पापी हाथों से कौरवों ने
आज मेरे शरीर ,मेरे मान को छुआ है
उन हाथों से क्या कभी
बड़ों का चरण स्पर्श हुआ है ?
अनुज-अग्रज, मान-अपमान का
जो शिष्य अंतर तक नहीं जानते हैं?
क्या उन्होंने कभी आपको सम्मान दिया है ?
क्या आपको वो अपना गुरु मानते हैं ?
हे गुरुवर कृपया मुझे उत्तर दें
क्या पत्नी पर पति का पूर्ण अधिकार है?
आपके उत्तर केवल उत्तर नहीं
मेरे मन के घाव का भी उपचार है।
(अपने प्रश्न के उत्तरों का आस लिए
द्रौपदी ने किया पतियों की ओर प्रस्थान ।
सोचती विचारहीन विवेकहीन पति मेरे
आज पत्नी या वस्तु का देंगे स्थान?)
संगीता

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दिल से
Nequ
मेरी दीदी को समर्पित
उनके अथक प्रोत्साहन हेतु