द्रौपदी चीरहरण
गौरवशाली इतिहास का वर्तमान
था आज लहूलुहान खड़ा
महारथियों से भरी सभा में
क्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा ।
द्रौपदी चीरहरण

सुनकर कुलवधू के प्रश्नों की बौछार
निर्लज्ज नरेश यह बोला ।
अब तक जिह्वा पर पड़ी शर्म की गांठ को
उसने कुछ यूं खोला ,
पुत्री अपने प्रश्नों के उत्तर तुम
पति युधिष्ठिर से पूछो ।
तुम्हें दांव लगाने वाला कौन
तनिक यह तो बूझो?
लेकर ज्येष्ठ पिता जी से आज्ञा
पहले गई कुलगुरु राजगुरु सम्मुख।
कुल की मान के अज्ञान पर भला
कैसे दोनों आचार्य हो सकते विमुख?
(कुरु वंश के कुलगुरु की स्थिति
आज अत्यंत विकट थी ।
कुल की मर्यादा का प्रश्न लेकर
जब कुलवधू पहुंची उनके निकट थी।)
संगीता

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दिल से
Nequ
मेरी दीदी को समर्पित
उनके अथक प्रोत्साहन हेतु