द्रौपदी चीरहरण

द्रौपदी चीरहरण

गौरवशाली इतिहास का वर्तमान
था आज लहूलुहान खड़ा
महारथियों से भरी सभा में
क्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा ।

द्रौपदी चीरहरण

साभार रंजना

कभी नैतिकता की मूर्ति भारतवर्ष में
यह था अनैतिकता का चरमोत्कर्ष।
की केशो तक जा पहुंचे थे हाथ
जिनको करना था चरणस्पर्श।

गौरवशाली इतिहास का वर्तमान
था आज लहूलुहान खड़ा
महारथियों से भरी सभा में
क्षत्रिय धर्म था निष्प्राण पड़ा ।

नीति निस्तेज, ज्ञान था मौन
धर्म भी हो उठा था लज्जित।
जब कुलवधू वस्त्रहरण संग
कुल मर्यादा हुई थी कलंकित?

वास्तव में दुशासन नहीं युधिष्ठिर ने
द्रौपदी के अपमान का केश खोला था।
चंद्रवंशी इस ज्येष्ठ कुंती नंदन का
चौसर हार से जब मन डोला था।

दुख के समुद्र की सारी सीमाएं लांघ कर
पांचाली को मिला था यह असह्य कष्ट।
धर्मपुत्र ने जब स्वयं आगे बढ़कर
पत्नी को दांव लगा किया था धर्म को भ्रष्ट।

आज नीति चुप थी, ज्ञान निरुत्तर
धर्म के हाथो था धर्म परास्त।
महान हस्तिनापुर के आकाश में
आज हुआ था मर्यादा का सूर्यास्त।

बिखेरा गया था मर्यादा का मान
ढलती प्रतिष्ठा के हर किरण में।
अपमानित की गई थी पांचाली
अपनों के द्वारा अपनो के ही शरण में।

अंग अंग जल उठा था द्रौपदी का
अपमान की इस कड़ी धूप में।
व्यथित आत्मा के अश्रु
सारे निकले प्रश्नों के रूप में।

संगीता

साभार साई सात्विक

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