विदाई
नारायण बापू का उत्साह धीरे धीरे उदासी में तब्दील हो रहा था ।इसी कशमकश में शाम हो गई ।सभी अपने अपने काम निपटा या रोजाना कि तरह समय बर्बाद करके कार्यालय से घर चले गए ।बड़ा साहब और उनके चहेते शराबी कर्मचारी और नारायण बाबू बच गए थे बस कार्यालय में।
विदाई

नारायण बाबू अपनी सरकारी ऑफिस के कुछ गिने-चुने ईमानदार व्यक्तियों में से एक थे। नारायण बाबू का ऑफिस सरकारी विभागों में सबसे भ्रष्ट विभागों में से एक था। नारायण बाबू को ना जाने कितनी बार दूसरी कमाई के अवसर मिले लेकिन नारायण बाबू अपने ईमान एवं अच्छे संस्कार के पक्के थे ।उन्होंने अपने आत्मविश्वास को कभी डिगने नहीं दिया । ऐसा नहीं था कि नारायण बाबू को धन जैसी लक्ष्मी का अनादर पसंद था या लक्ष्मी की जरूरत नहीं थी लेकिन उनके पास स्वयं का बहुत बड़ा धन था और वह धन था संतोष का धन।
नारायण बाबू ईमानदार होने के साथ-साथ सामाजिक व्यक्ति भी थे ।समाज कल्याण के कार्य भी अपनी सूखी कमाई से ही करने की कोशिश करते। स्वयं का अपना बड़ा परिवार था ।परिवार में पांच बेटियां श्रीमती जी एवं एक पुत्र था ।साथ में छोटे चाचा के छोटे लड़के का पालन पोषण एवं भगिने का भार अलग से। परिवार भरा पूरा था। सूखी कमाई के चलते किराने वाले से, दूध वाले से ,पेपर वाले से ,महीनों उधारी चलते ।यहां तक कि मकान मालिक का किराया भी उधारी में महीनों तक चलता किंतु नारायण बाबू की ईमानदारी का ऐसा प्रभाव था उन सब पर कि किसी ने भी कभी उनसे तगादा नहीं किया। नारायण बाबू स्वयं ही पक्का हिसाब में विश्वास करते थे और वेतन मिलते ही पहले का सारा उधारी चुकता करते और फिर नए उधारी से घर चलाते। नारायण बाबू अपनी सूखी कमाई से संतोषप्रद जीवन जीने में सुख का अनुभव करते थे ।उन्हें अपने से साथी कर्मचारी के दोहरी कमाई से होने वाली दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति से कोई शिकवा शिकायत नहीं थी। नारायण बाबू भरसक कोशिश करते अपने साथी कर्मचारियों को पाप की कमाई से बचाने का। उन्हें नेक सलाहे दिया करते किंतु उनके साथी कर्मचारी उनके आर्थिक कष्टों को देखते हुए स्वयं के सिद्धांत को ही सही मानते ।भ्रष्ट साथी कर्मचारियों का यह अटूट विश्वास था कि आती हुई लक्ष्मी को कभी मना नहीं करना चाहिए इससे लक्ष्मी का अपमान होता है ।किंतु नारायण बाबू का अपना अटूट विश्वास था कि पानी का पैसा पानी में जाता है। साथ ही उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों से सीखा एवं परखा था कि घूस कमाने वाले लोग कुछ ज्यादा ही अशांत रहते हैं ,ऊपरी कमाई वालों के बच्चे अच्छे नहीं बनते हैं। उनके सामने ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े थे, किंतु उनके साथी कर्मचारी का यह भी मत था कि अपने बच्चों के लिए वह इतना कमा कर छोड़ जाएंगे कि बच्चे नहीं भी कुछ बने तो भी उन्हें रोटी के लाले नहीं पड़ेंगे। परिवार सदियों तक सुख से जीवन व्यतीत करेगी। नारायण बाबू अपने सिद्धांत के पक्के थे एवं उनके विभागीय कर्मचारी अपने विश्वास के। नारायण बाबू के सिद्धांत किसी को भी नहीं भाते थे। कदाचित बहुत बार उन लोगों को नारायण बापू की ईमानदारी से चिढ़ भी होती थी ।कारण था कि नारायण बाबू जिन कामों को अपना कर्तव्य समझकर मुफ्त में कर दिया करते थे ,उन्हीं कामों के लिए बाकी बाबू लोगों के जूते घिसवा दिया करते थे ।सरकारी विभाग था तो हर काम के लिए रेट थे, मनचाही पोस्टिंग का रेट अलग, फाइल निकलवाने का रेट अलग,ट्रांसफर रुकवाने का रेट अलग, ट्रांसफर करवाने का रेट अलग,बड़े साहब तक बात पहुंचवाने का रेट अलग,बड़े साहब से मिलवाने का रेट अलग,और हां इन रेटो का जाति ,धर्म और क्षेत्र से कोई भेदभाव नहीं था ।भ्रष्टाचार का दर ऑफिस के साथ साथ पूरे देश में बिल्कुल ही एकसमान था,धर्मनिरपेक्ष एवम पंथनिरपेक्ष।संविधान के मौलिक अधिकारों में से एक समानता का अधिकार,इस अधिकार का घूस लेने देने में सर्वाधिक उपयोग होता था।
पद में वरिष्ठ होने के बावजूद नारायण बाबू को अपनी ईमानदारी का यह प्रतिफल मिला था कि वह सीलनदार, बदबूदार, फाइलों से भरी अलमारी वाले तंग कमरे में अपने पैसों से खरीदी बल्ब की रोशनी में काम में तन मन से लगे रहते थे ।उन्हें इस बात से कोई परेशानी नहीं थी कि उनके निचले कर्मचारी को बड़े साहब ने घूस दिलवाने के एवज में एक पंखादार ,हवादार आराम भरा कमरा दे रखा था जहां काम कम ,काम की दरें ज्यादा तय होती थी। ना जाने किस मिट्टी के बने थे नारायण बाबू ।चुपचाप अपने काम में तल्लीन रहते । किसी से कोई शिकवा शिकायत नहीं उनको। सभी से संबंध अच्छे थे। हां उनकी अच्छी बातें सब बेईमानों को जरूर चुभती थी।
पुराने बड़े साहब का तबादला हुआ तो अगले ही दिन नए साहब ने ज्वाइन कर लिया। पदभार ग्रहण करते ही नए साहब ने भांप लिया था कि यहां से कुछ मिलने वाला नहीं है। बड़े साहब को खूब शराब पीने की आदत थी । नारायण बाबू की इमानदारी उनकी आंखों को चुभती थी। इससे पहले भी साहब लोग थे जो लेनदेन ,पीने -पिलाने में विश्वास रखते थे ।कार्यालय कार्य अवधि के पश्चात मयखाना में तब्दील हो जाया करता था। नारायण बाबू इस मंडली से दूरी बनाकर रखते थे ।पहले वाले साहब लोगों ने मान लिया था कि नारायण बाबू के सिद्धांत अलग है, सो वे साहब लोग नारायण बाबू को उसी रूप में स्वीकार करते थे ।किंतु नए साहब को यह पच नहीं रहा था कि उनके अधीनस्थ कोई कर्मचारी इतना अलग कैसे हो सकता है। अतः साहब नारायण बाबू पर तंज कसने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। गलती निकाल निकाल कर उन्हें जलील करने की कोशिश करते ,किंतु नारायण बापू का काम इतना पक्का होता था कि फाइलों में कोई गलती ढूंढना मुश्किल था। तो बड़े साहब ने नया करण ढूंढ निकाला ।सुबह अक्सर नारायण बाबू को ऑफिस आने में देर हो जाती थी। बड़े साहब इसी ताक में रहते थे और हमेशा नारायण बाबू को खरी खोटी सुनाते।आज तो खरी खोटी सुनाते सुनाते वह इतनी नीचता पर उतर आए कि नारायण बाबू को मां बहन की गाली देने लगे। नारायण बाबू के सब्र का बांध टूट गया ।उन्होंने उसी क्षण साहब को चेताया कि अगर वह भूल गए हैं कि अपने अधीनस्थ कर्मचारी से सम्मान पूर्वक बात कैसे किया जाता है तो फिर नारायण बाबू भी भूल जाएंगे कि वो उनके साहब है ।और हां खबरदार जो फिर कभी मां बहन की गाली दी ,फिर तो मुझसे बुरा कोई व्यक्ति नहीं होगा। कार्यालय के काम में परिवार को घसीटने कि कोई जरूरत नहीं है। फ़िर थोड़ा संयमित होते हुए नारायण बाबू ने साहब को कहा, साहब आपके भी बीवी बच्चे हैं, मैं उन्हें नहीं जानता लेकिन फिर भी कभी उनके लिए ना बुरा कहूंगा और ना सोचूंगा।आप भी आगे से इस बात का ध्यान रखिएगा। नारायण बाबू के बड़े साहब ने बड़ा अपमानित महसूस किया नारायण बाबू के जवाब से ।
अपने 32 वर्ष की सेवा में इसी प्रकार कभी ईमानदार तो कभी बेईमान साहबो के साथ,खट्टे मीठे अनुभव को जीते हुए आखिरकार नारायण बाबू के जीवन में वह क्षण भी आया जब उन्हें इन सभी जंजाल से मुक्ति मिलने वाली थी। आज नारायण बापू की सेवानिवृत्ति का दिन था। नारायण बाबू के मन में लड्डू फूट रहे थे ।बच्चों की भांति खुशी उनके चेहरे से छुपाए नहीं छुप रही थी। ईमानदारी पूर्वक काम के बदले नौकरी के अंतिम वर्ष में मिले अपमान एवम मनमुटाव को झेलने वाले नारायण बाबू आज सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त थे। उन्होंने मन ही मन साहब को माफ कर दिया था और मन में यह विश्वास पाल बैठे थे कि साहब भी सबकुछ भूल भालकर उन्हें सम्मान पूर्वक सेवा से विदाई देंगे ।रोजाना टैंपू से जाने वाले नारायण बाबू ने आज एक कार किराए पर लिया कार्य स्थल पर पहुंचने हेतु ।पत्नी को भी उल्लास पूर्वक कह दिया कि वह शाम में तैयार रहे उनके कार्य स्थल पर आने के लिए। नारायण बाबू को मन में आज आशा थी कि सब कार्यस्थल पर खुशी खुशी उनके साथ समय बिताएंगे ।उनके साथ बिताए पलों को दोहराएंगे। पुरानी अच्छी यादें साझा करेंगे और उन्हें सम्मान पूर्वक विदाई देंगे ।लेकिन यह क्या कार्यालय में सभी अन्य दिनों की तरह से बर्ताव कर रहे थे। सभी अपने अपने कामों में इस क़दर व्यस्त थे कि लग रहा था किसी को नारायण बाबू कि सेवानिवृत्ति याद ही नहीं। नारायण बाबू का दिल बैठने लगा।पुराने सहकर्मी याद आने लगे जो विचारों में फर्क के बावजूद नारायण बाबू को पूरा सम्मान देते। हंसी खुशी कार्यालय में सभी साथ काम करते।लेकिन उनमें से अधिकांश सेवानिवृत हो गए थे या उनका तबादला हो गया था।अभी तो इस साहब के कार्यालय आने के बाद ऐसा माहौल बन गया था कि नारायण बाबू एक तरफ और बाकी कर्मचारी एक तरफ, खासकर उस दिन कि घटना के बाद।
ना नारायण बाबू ने कोई गलती की थी ना ही बड़े साहब ने अपनी गलती स्वीकारी थी।
नारायण बाबू का उत्साह धीरे धीरे उदासी में तब्दील हो रहा था ।इसी कशमकश में शाम हो गई ।सभी अपने अपने काम निपटा या रोजाना कि तरह समय बर्बाद करके कार्यालय से घर चले गए ।बड़ा साहब और उनके चहेते शराबी कर्मचारी और नारायण बाबू बच गए थे बस कार्यालय में। साहब पद में बड़े थे किंतु विचारों से बिल्कुल छोटे ।बड़े साहब को नारायण बाबू को अपमानित करने का शुभ अवसर मिला था ।और आज तो वह अन्तिम अवसर था।उन लोगों ने नारायण बाबू को सेवानिवृत्ति की शुभकामना तक नहीं दी और बैठ गए अपनी-अपनी शराब का प्याला लेकर, कार्यालय को मयशाला बनाने।
कार्यालय के बाहर नारायण बाबू को घर ले जानेवाली कार की हॉर्न बज रही थी और नारायण बाबू के मन के अंदर ईमानदारी के बदले मिली अपमान की घंटी। कदम धीरे धीरे कार की तरफ़ बढ़ाते नारायण बाबू को पीछे से 10-20 लोगों ने आवाज़ दी -साहब रूकिए जरा।नारायण बाबू ने मुड़कर देखा -बहुत सारे लोग हाथों में फूल माला ,बुके और कुछ उपहार लिए उनकी तरफ बढ़े चले आ रहे थे। उन लोगों ने नारायण बाबू के पास आते ही उनके गले में फूलों की माला पहना दी और अश्रुपूर्ण विदाई देते हुए फूल और उपहार देते हुए कहा- साहब आप ने हम सबकी बहुत मदद की है।हमारे काम निस्वार्थ भाव से पूरे करवा दिए हैं।कभी एक खिल्ली पान की भी फरमाइश नहीं की हम सबसे। पता नहीं हम गरीबों का अब काम कैसे होगा इस दफ्तर से।खैर जो भी हो,आप हमारे देवता समान व्यक्ति है।भगवान आपको लंबी आयु और स्वस्थ जीवन दे।फिर कार में बैठी नारायण बाबू की धर्मपत्नी की ओर मुखातिब होते हुए उन्होंने एक सुंदर सी साड़ी थमाते हुए कहा- भाभी जी हम लोगो को जो समझ में आया वो ले आए।इसे स्वीकार कीजिएगा तो नारायण बाबू के साथ साथ हमें भी अच्छा लगेगा।
नारायण बाबू की आंखों में खुशी और चेहरे पर संतोष के भाव ने फिर से अपना डेरा जमा लिया था। ईमानदारी का सिर फिर ऊंचा हो उठा था।श्रीमती जी का चेहरा भी पति के अनूठे विदाई से गर्व से चमक रहा था।
संगीता

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