हॉस्टल के दिन

हॉस्टल के दिन

उदास क्षणों की पीड़ा यार जब हरते
अजनबी यारों की यारी पर हम मरते
कुछ इस तरह हम जिंदगी जिया करते
थोड़ा सा डूबते थोड़ा सा उभरते

हॉस्टल के दिन

साभार साई सात्विक

शाखों से जैसे पत्ते हैं गिरते
जिस तरह हैं मौसम बदलते
कुछ इस तरह हम जिंदगी जिया करते
थोड़ा सा डूबते थोड़ा सा उभरते

समस्याओं से हम हर रोज हैं घिरते
फिर भी मुश्किलों को पीछे हैं ठेलते
कुछ इस तरह हम जिंदगी जिया करते
थोड़ा सा डूबते थोड़ा सा उभरते

मन की नाकामियों से हर दिन हैं भिड़ते
हार कर फिर उनसे उबरने की कोशिश करते
कुछ इस तरह हम जिंदगी जिया करते
थोड़ा सा डूबते थोड़ा सा उभरते

छोटी-छोटी बातों पर हम यार लड़ते
दिल दुखा देने पर फिर चुप रहते
कुछ इस तरह हम जिंदगी जिया करते
थोड़ा सा डूबते थोड़ा सा उभरते

उदास क्षणों की पीड़ा यार जब हरते
अजनबी यारों की यारी पर हम मरते
कुछ इस तरह हम जिंदगी जिया करते
थोड़ा सा डूबते थोड़ा सा उभरते

यादों के बादल आंखों से जब झड़ते
यार अपने अपनों का रूप धरते
कुछ इस तरह हम जिंदगी जिया करते
थोड़ा सा डूबते थोड़ा सा उभरते

एक दूजे के साथ हम बढ़ते संवरते
दोस्त अच्छे, रंग सच्चे हैं भरते
कुछ इस तरह हम जिंदगी जिया करते
थोड़ा सा डूबते थोड़ा सा उभरते

संगीता

साभार रंजना

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