महामारी और मेरा तबादला
मेरा तो बस सपना था कि
मैं सिर्फ एक गृहिणी बनकर जीऊं
पति ,परिवार ,पैसे के साथ
जिंदगी के सुख का हर रस पिऊं
महामारी और मेरा तबादला

मुझे नहीं पता मेरी नौकरी
मेरा शौक है या सपना
लेकिन मैंने ऐसा कभी नहीं चाहा
कि पास ना हो कोई मेरा अपना
मेरा तो बस सपना था कि
मैं सिर्फ एक गृहिणी बनकर जीऊं
पति ,परिवार ,पैसे के साथ
जिंदगी के सुख का हर रस पिऊं
लेकिन इस नौकरी की बदौलत
मैंने ढेरों सुख भी पाया है
बच्चे का नामांकन, परिवार का गौरव
सब का जड़ इसमें ही समाया है
फिर भी एक पीड़ा मेरे अंदर
मुझको हमेशा सालती रहती है
बच्चों को पूरा समय ना देने पर
लगे नौकरी करना मेरी एक गलती है
ऊपर से महामारी में तबादले से
मैं कोरोना योद्धा अकेली ही रह रही हूं
बच्चे और सास ससुर के सेहत की खातिर
परिवार से जुदाई का दर्द सह रही हूं
पर अपने बच्चे से दूर रहना
कोई मुझ मां से पूछे कि क्या होता है
अकेली अंधेरी रातों में बच्चों के बिना
मेरा दिल जब जार जार रोता है
लेकिन महामारी में महा मजबूरी है
कि मैं नौकरी किए जा रही हूं
तबादले से घर वापसी की आस लिए
बिना परिवार के ही जिए जा रही हूं
अब क्या करूं जब महामारी में
अभी जिंदगी ही दांव पर लगी है
तो अपनों को खोने से बेहतर
मेरा अकेले रहना ही सही है
संगीता

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