कृष्ण स्वपन
उन सांसो के संग ही हर दिन मैं सोता हूं
हर रात तुम्हारे सपनों में खोता हूं
फिर तुम मेरे सपनों में आती हो
अपनी गुलाबी मुस्कान बिखराती हो
कि मुझे लगता ही नहीं
महीना हो गए हमें बिछड़े हुए..………………………..
कृष्ण स्वपन

मैं तुम्हें अपनी नैनों में भरता हूं
तुम्हारी यादों में डूबा धीरे से कहता हूं
क्या रहते हैं तुम्हारे घुंघराले बाल
अभी भी गालों पर बिखरे हुए।
तुम इस तरह मेरे सपनों में आती हो
अपनी गुलाबी मुस्कान बिखराती हो
कि मुझे लगता ही नहीं
महीनों हो गए हमें बिछड़े हुए ।
तुम मेरे और करीब आती हो
अपने कांधे को मेरे होठों के पास सरकाती हो
पूछती हो अभी भी मेरा ही हृदय है
तुम्हारे चक्कर काटने के लिए।
होठों से छू मैं तुम्हारी अधरों को पीता हूं
कुछ क्षण के लिए केवल तुम में जीता हूं
तब कहता हूं प्रिय हमारा प्रेम अनमोल है
युगो तक प्रेमियों में बांटने के लिए।
तुम मेरे हृदय को हाथों से सहलाती हो
सिर रखकर अपने अश्रु से नहलाती हो
विरह के दिन याद कर मुझसे पूछती हो
क्या मुझे याद करते थे मुरलीधर ?
मैं धीरे-धीरे तुम्हारे अश्रु पोंछता हूं
अपनी शरारत भरी मुस्कान संग सोचता हूं
कि इस प्रश्न का उत्तर तो तुम जानती हो
फिर भी उत्तर दे देता हूं तुम्हें हंस कर।
तुम मेरे ऊपर केशों की छाया करती हो
मुझको अपनी बाहों में भरती हो
फिर मुझ से नैन मिला कर कहती हो
मैं कब से थी इस मिलन की आस में।
मैं तुम्हारी उष्मा से पिघलता हूं
तुममें जीवनधारा बन उतरता हूं
तुम्हारे कमल नैनों की मदिरा में डूब कर
घुल जाता हूं तुम्हारी हर सांस में।
उन सांसो के संग ही हर दिन मैं सोता हूं
हर रात तुम्हारे सपनों में खोता हूं
फिर तुम मेरे सपनों में आती हो
अपनी गुलाबी मुस्कान बिखराती हो
कि मुझे लगता ही नहीं
महीना हो गए हमें बिछड़े हुए…………………………
संगीता

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दिल से
Nequ
मेरी दीदी को समर्पित
उनके अथक प्रोत्साहन हेतु